साँवली परी

जैसे सब अनजान वैसे वो अनजान,
न खुद से मिली, न मुझ से मिली,
कभी उड़ती थी क्या?
कहीं उड़ती है क्या?
वो साँवली परी तुझे दिखती है क्या?

जो तुझमे छिपी, जो कि मुझमें नहीं,
कहीं मुझसी जो है, वो तू तो नहीं?
कहीं तू तो नहीं?
अरे, तू ही तो है।
कभी दिखी थी जो यूँ, कि कोई साँवली परी।

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मुझे जीना नहीं आता (बशर नवाज़)

मैं जैसे दर्द का मौसम,
घटा बन के जो बस जाता है आँखों में
इन्द्रधनुष के रंग खुशबू नज़र करने की तमन्ना लेकर
जिस नज़ारे तक जाऊं
उसे आंसुओं के कोहरे में, डूबा हुआ पाऊं।

मैं अपने दिल का सोना, प्यार के मोती,
तरसते उम्मीदों के फूल, जिस दरवाज़े पर सजाता हूँ,
वहां जैसे रहता नहीं कोई।

बना हूँ कई दिनों से आवाज़ ऐसी
जो दीवारों से टकराए,
हताश हो के लौट आए,
धड़कते दिल के सूनेपन को सूना और कर जाए।

मैं अपने आप को सुनता हूँ,
अपने आप को छूता हूँ,
अपने आप से मिलता हूँ, सपनों के सुनहरे आईनाघर में।
तब मेरी तस्वीर मुझ पे मुस्कुराती है
कहती ये है,
हुनर तुझे जीने का न आना था, नहीं आया।

आवाज़ें पत्थरों की तरह मुझ पर
मेरे सपनो के सुनहरे आईनाघर पर बरसती हैं।
इधर तारा, उधर जुगनू
कहीं फूल की पत्ती, कहीं ओस का एक आँसू,
बिखर जाता है सब कुछ आत्मा की सुबह में।

मैं फिर से ज़िन्दगी जीने के अरमानों में
एक एक रेशे को चुनता हूँ, सजाता हूँ, नई मूरत बनाता हूँ।
इन्द्रधनुष के रंग, खुशबु नज़र करने की तमन्ना में
कदम आगे बढ़ाता हूँ।
तो एक बेनाम गहरी धुंध में, सब कुछ डूब जाता है,
किसी से कुछ शिकायत है, ना शिकवा है।

मैं तो दर्द का मौसम हूँ,
अपने आप में पलता हूँ, अपने आप में जीता हूँ,
अपने आंसुओं में डूबता हूँ, मुस्कुराता हूँ।
मगर सारे लोग कहते हैं
तुझे जीना नहीं आता।
मुझे जीना नहीं आता।

bashar-nawaz11