एक बीज

बीज बहुत से हैं।
बहुत से हैं जिनमें हलचल होती है
कुछ तो होता है,
पर सभी पेड़ नहीं बनते।
कुछ मिटटी में दबे रहे गए;
दबे तो इसलिए थे
कि उठेंगे
टूटेंगे, और तोड़ेंगे
जब आकाश देखेंगे
आसमान माँगेंगे; रौशनी छुएंगे।

घुल गए आपस में;
हाथ बढ़ाया उसने
और उसने पकड़ लिया –
किसी नई दुनिया में बुलाया हो जैसे।
यूँ हाथ थामना कुछ माँगना तो नहीं है?
हवा को, धूप को छूना –  कुछ माँगना नहीं।

बीज घुल चुका है मिट्टी में
मिट्टी ने इसे तोड़ा नहीं
हाथ थामा, और दे गई धूप;
कि इसे भी मिले आसमान।

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उधार (अज्ञेय)

सवेरे उठा तो धूप खिली थी।

सवेरे उठा तो धूप खिल के छा गई थी
और एक चिड़िया अभी-अभी गा गई थी।
मैंने धूप से कहा : मुझे थोड़ी गरमाई दोगी उधार?
चिड़िया से कहा : थोड़ी मिठास उधार दोगी?
मैंने घास की पत्ती से पूछा : तनिक हरियाली
दोगी –
तिनके की नोक भर?
शंखपुष्पी से पूछा : उजास दोगी –
किरण की ओक भर?
मैंने हवा से माँगा : थोड़ा खुलापन – बस एक प्रश्वास,
लहर से : एक रोम की सिहरन भर उल्लास।
मैंने आकाश से माँगी
आँख की झपकी भर असीमता उधार।

सब से उधार माँगा, सब ने दिया।
यों मैं जिया, और जीता हूँ
क्योंकि यही सब तो है जीवन –
गरमाई, मिठास, हरियाली, उजाला,
गन्धवाही मुक्त खुलापन,
लोच, उल्लास, लहरिल प्रवाह
और बोध भव्य निर्व्यास निस्सीम का :
ये सब उधार पाए हुए द्रव्य।

रात के अकेले अन्धकार में
सपने से जागा जिसमें
एक अनदेखे अरूप ने पुकार कर
मुझसे पूछा था : ‘क्यों जी,
तुम्हारे इस जीवन के
इतने विचित्र अनुभव हैं
इतने तुम धनी हो,
तो मुझे थोड़ा प्यार दोगे उधार जिसे मैं
सौ गुने सूद के साथ लौटाऊँगा –
और वह भी सौ-सौ बार गिन के –
जब-जब मैं आऊँगा?’

मैंने कहा : प्यार? उधार?
स्वर अचकचाया था क्योंकि मेरे
अनुभव से परे था ऐसा व्यहवार।
उस अनदेखे अरूप ने कहा : ‘हाँ,
क्योंकि यही सब चीज़ें तो प्यार हैं –
यह अकेलापन, यह अकुलाहट,
यह असमंजस, अचकचाहट,
आर्त अननुभव
यह खोज, यह द्वैत, यह असहाय
विरह-व्यथा
यह अन्धकार में जागकर सहसा पहचानना कि
जो मेरा है वही ममेतर है।
यह सब तुम्हारे पास है
तो थोड़ा मुझे दे दो उधार – इस एक बार –
मुझे जो चरम आवश्यकता है।’
उसने यह कहा,
पर रात के घुप अँधेरे में
मैं सहमा हुआ चुप रहा; अभी तक मौन हूँ :
अनजाने अरूप को
उधार देते मैं डरता हूँ :
क्या जाने
यह याचक कौन है।

(साभार: कितनी नावों में कितनी बार – अज्ञेय का ज्ञानपीठ-पुरस्कृत कविता संकलन)

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