तन्नु, मन्नू और टीपू सुल्तान का रॉकेट

– दीदी, नाक में कुछ घुस गया।
– नाक में घुस गया तो मुँह क्यों खोल के बैठी है?
– नाक से मुंह में जा रहा है। बीच में फँस गया।
– छी! गन्दी लड़की। नाक बंद कर और साँस छोड़।
– वो कैसे करते हैं?
– जैसे नाक छिनकते हैं।
– नहीं हो रहा।
– पहले मुँह बंद कर।

“तन्नु!”

– अम्मा बुला रही है।
– मुझे नहीं बुलाया।
– तो बैठी रह। अभी टीपू सुल्तान आएगा, तुझे रॉकेट में बाँध के उड़ा देगा।
– टीपू सुल्तान कौन है?
– कोई राजा है।
– उसके पास बहुत सारे रॉकेट हैं?
– हाँ, बहुत बड़े-बड़े।
– मुझे तो छोटा वाला रॉकेट चाहिए।
– अरे दीवाली तो बीत गई; अब अगले साल चलाएंगे, बड़ा वाला। अम्मा से बोल तेरी नाक साफ़ करेगी।
– बड़ा वाला रॉकेट?

आतंक और मेरे अपने

26/11 की बात होती है तो मुंबई की स्पिरिट की तारीफ़ होती है – जिंदादिल शहर। मैं कभी मुंबई नहीं गया। इस हमले से जुडी मेरी यादें भी उतनी हैं, जितनी भीड़ में खड़े एक तमाशाई की होती हैं। टीवी पर देखा, अखबारों में पढ़ा, देश पर ये एक बहुत बड़ा आतंकवादी हमला था। पर आतंक को ले कर मेरी यादें इस दिन की नहीं, दिसंबर 2014 की हैं; दिल्ली की।

एक लड़की टैक्सी में अपने घर जा रही थी, अकेले। अकेले तो नहीं, क्योंकि टैक्सी चलाने वाला ड्राईवर तो था ही। पर ड्राईवर एक आतंकवादी था। अगले दिन अखबारों में खबर छपी आतंकवाद की। मैं डर गया था। लड़की ने टैक्सी महात्मा गांधी रोड, गुडगाँव से ली थी; मेरी एक दोस्त भी महात्मा गांधी रोड पर ही एक कंपनी में काम करती थी। मैंने उसे फ़ोन किया, हाल चाल पूछा। वो ठीक थी, सुरक्षित, सेफ। पर वो लडकी – जो मेरी दोस्त तो नहीं थी, ना जिससे मैं मिला था कभी – जाने कैसी थी, उन दिनों।

अखबार में एक रिपोर्ट छपी थी कुछ महीनों बाद, उसके बारे में – वो आतंक के साए से निकल रही थी। कुछ चीज़ें बदल गई थीं उसकी जिंदगी में। उसके पापा वापिस इंडिया आ गए थे, उसके पास; उसने ड्राइविंग सीख ली थी, पहले कार नहीं थी; कभी जरूरत महसूस नहीं हुई थी। अब कोर्ट जाना था; आतंकवादी से लड़ना था। कोर्ट की कार्यवाही अखबारों में छपती रही। पढ़ के पता चला कानून ने आतंकवादी को कुछ हथियार दिए थे, जिनसे वो अभी भी उस लड़की को आतंकित कर सकता था। उम्मीद है क़ानून और उसके परिवार, दोस्तों के साथ का बुलेट-प्रूफ जैकेट इस बार उसे बचा सका हो। इस 4 नवम्बर को सजा सुनाई गई है, मौत तक कारावास।

मैं नहीं जानता उस लड़की को। जो दो लडकियां अभी यहाँ से गुज़री हैं, शायद वो इनमें से ही हो। ये हँसते-दौड़ते लोग, ये बच्चे, वो माँ, ये आवाजें ख़ुशी की, शायद वही परिवार है।

मैं नहीं जानता उस लड़की को, ना उस आतंक को, जिस का एक छोटा कतरा मुझ तक पहुँचा था, उस हवा में बह कर जिस में हम साँस लेते हैं, जिसमें ‘हमारे अपने’ रहते हैं।