माँस का टुकड़ा

तुम हो क्या?
माँस का टुकड़ा –
प्राण-शून्य शरीर
बस।
इसके आगे कुछ भी नहीं।
तो तुम्हें क्या
अगर मैं तुम्हें चाहूँ
न चाहूँ।

जो तुम्हें दिखता है
वो मेरी नज़रों के सामने भी गुजरा है
पर ठहरा नहीं।
जो मैने देखा है
वो तुमने नहीं देखा कभी –
वो माँस का टुकड़ा
जो तुम हो।

Advertisements

मृगतृष्णा – २

मैं कौन हूँ
कब हूँ
कहाँ हूँ
क्यों हूँ
बता दो मुझे
तुम
जो समझ चुकी हो
कि मैं कहीं नहीं हूँ
अभी
पर कुछ हूँ।
क्या देखती हो तुम मुझमें
जो मैं नहीं देख पाता?